Thursday, April 10, 2008

नाराज़गी दूर हो गई

एक आदमी अखरोट के पेड़ के नीचे बैठा था । पेड़ के पास कदू की बेल थी । बेल के पास एक बहुत बड़े कदू पर उसकी नज़र पड़ी ।
उस आदमी ने नाराज़गी से कहा ," भगवान तुम्हारी मुर्खता का भी जवाब नही ! इतने बड़े पेड़ के इतना सा फल और इस जरा सी बेल के इतना बड़ा फल! अगर इस विशाल पेड़ पर कदू लगते और इस बेल पर अखरोट टू मे तुम्हारी बुद्धि को मान जाता।"
उसका यह कहना हुआ और एक अखरोट टाप से उसके सर पर गिरा । वह चौंक पड़ा । बोला ,"प्रभु तुम ठीक हो । अगर इतने ऊंचाई से कदू मेरे सिर पर गिरता तौ मे मर गया होता । तुम्हारी बुद्धि और दया अपार है ."

अहिंसा

किसी दुरत साँप ने इक मार्ग के पास डेरा डाला और हर आने जाने वाले को काटने लगा ।एक बार एक साधू उधर से निकला । साधू को देखते ही साँप उसे डसने के लिए दोडा। साधू ने उसे प्यार से देखा और शान्ति से कहा,"तुम मुझे काटना चाहते हो , है न ? आओ , अपनी इछा पूरी करो। "
साधू की अप्रत्याशित प्रतिक्रिया और सज्जनता से साँप अभिभूत हो गया। साधू ने कहा,"मित्र , मुझे वचन दो कि आज के बाद तुम किसीको नही काटोगे। "साँप ने उसे प्रनाम किया और वचन दिया कि अब वहकिसीको नही कटेगा। साधू आगे बाद गया । साँप सीधा सादा अहिंसक जीवन बिताने लगा।
कुछ ही दिनों मे सब जान गए कि अब इस साँप से डरने कि कोई जरूरत नही है। बचे उसके साथ बहुत क्रूर व्यवहार करने लगे। वे उसे पत्थर मारते और पूँछ पकड़ कर घसीटते । तमाम यातनाए भुगत कर भी साँप ने साधू को दिया अपना वचन नही तोडा ।
कुछ समय बाद साधू अपने नए शिष्य से मिलने आया। उसका घ्याल और सूजा हुआ शरीर देखकर गुरु भीतर से हिल गया । उसने साँप से पूछा कि उसकी यह हालत कैसे हुई । साँप ने कमजोर आवाज मे कहा,"गुरुदेव,आपने मुझे काटने से मन किया था.पर लोग बहुत क्रूर है ।"
साधू ने कहा ,"मैंने तुम्हें काटने के लिए मन किया था फुफ्कारने के लिए नही."

Saturday, March 15, 2008

साए कहाँ थे राह मे जो बैठते मदन, हम ने किए सफर बहुत सख्तियों के साथ